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 तीरथ सिंह रावत का  वक्तव्य और पश्चिमी चिंतन  

संस्कृति कोई लिखित कानून नहीं होता अपितु यह हजारों वर्षों के अनुभवों से उत्पन्न जीवन शैली होती है। इसीलिए हर धरा के लोग अपनी संस्कृति को उत्तम मानते हैं।  भारत ही एक ऐसा देश है जिस ने अपनी संस्कृति के साथ साथ विदेशी मान्यताओं, व्यंजनों, एवं उत्सवों को भी खुले दिल से अपनाया है।  दूसरों की अच्छईयों  को आत्मसात कर लेना भारतीय संस्कृति के खुले व सवतंत्र मन को दर्शाता है।  

भारत ऐसा देश है यहाँ के लोगों ने चार्वाक व बुद्ध के ना-ईश्वरवाद  और अब्राहमवादी एक अल्लाह के सिद्धांत दोनों को महत्वपूर्ण स्थान दिया।  इस संस्कृति की लचकता इस से भी मालूम होती है कि भारत में ईश्वर को मानने के सैंकड़ों मत और हजारों तरह की प्रार्थनाएं हैं।  संसार में ऐसा कोई धर्म नहीं है जिसकी कोई आचार संहिता (कोड ऑफ़ कंडक्ट) ना हो। परन्तु भारत अनूठा है यहाँ मान्यताओं पर कोई भी व प्रतिबंधित कर्तव्य पालनता प्रतिबद्धता नहीं है। कोई भी कैसे भी नाच कर गायन  कर, रोकर, हंसकर, कैसे भी कपडे पहन कर या नंगा रहकर अपनी मान्यताओं को जी सकता है।  

देश में कुछ लोग अपनी संस्कृति की निंदा करते हैं और उन लोगों जैसा बनना चाहते हैं जिन लोगों ने सामाजिक जीवन से लेकर धार्मिक मान्यताओं में इतने कड़े नियम बना रखे हैं कि मानव मानव ना होकर एक गुलाम प्रतीत होता है।  उनकी मानसिक गुलामी उनके कपड़ों तक से पहचान सकते हैं। ऐसे मेँ भारत को सेकुलरिज्म का पाठ पढ़ाना सूर्य को दीपक दिखाना मात्र है।  

आज इस निबंध का सम्बन्ध उत्तराखंड के नवनियुक्त मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत उस वक्तव्य से है जिसमें उन्होंने बच्चों को अर्धनग्न जींस पहनने पर बोल दिया था।  


सामाजिक मान्यताओं के मामले मेँ मनुष्यता दो तरह की अति पर चल रही है।  एक और  मध्य पूर्व के राष्ट्र हैं यहाँ महिलाओं को कपड़ों मेँ इस तरह ढांप कर रखा जाता है कि वे कोई जीवित मानव ना होकर कोई निर्जीव वास्तु हों। 

उनके वैवाहिक व् शैक्षणिक अधिकारों का तो कोई सवाल ही नहीं है। भारत मेँ ही ट्रिपल तलाक जो महिलाओं के मानवीय मूल्यों  हेतु लिया गया निर्णय भी करोड़ों के दिलों मेँ सही से नहीं बैठ रहा है।  

दूसरी तरफ पश्चिमी सभ्यता है जिसमें समाज पूर्णतया नग्न दिखाई देता है। एक दृष्टि से यह अति सवतंत्रता ठीक प्रतीत होती है परन्तु उसका एक भयाव्य सत्य भी है । अमेरिका को ही गणना मेँ लें तो 30% से 35% तक महिलाएं  बिना परिवार के ही जीवन यापन करती हैं। और उनमें से 80% मनोरोगों से ग्रस्त हैं। बच्चों का योन शोषण तो सामान्य बात है क्योंकि ऐसे मामलों मेँ पिता अधिक्तर दूसरी शादी से होते हैं। 50% शादीयों  मेँ तलाक हो जाता है। इस सबके विपरीत 1950 से पहले हमारे अधिक्तर देशवासीओं ने तलाक शब्द सुना ही नहीं था।

मानव चेतना मेँ काम वासना प्रथम महत्वपूर्ण भावना है। इसके बिना जीवन संभव ही नहीं परन्तु सभ्य कामवासना मानव को मानव और असभ्य कामवासना मानव को दानव बना देती है । विपरीत लिंग का आकर्षण सहज मानवीय अवस्था है परन्तु उसका नंगा प्रदर्शन जानवरों मेँ पाया जाता है।  कुछ संवेदनशील जानवर भी यह काम खुले मेँ नहीं करते परन्तु कुछ असंवेदनशील लोग ऐसे कृत्यों को अंजाम देते हैं कि मानव तो क्या जानवर की आत्मा भी कांप जाती है।  अगर इस को कामवासना के दमन के रूप मेँ भी देखें तो भी पश्चिमी देशों मेँ बलात्कार की घटनाएं भारत से कोई कम नहीं हैं। 

इसमेँ कोई अन्यत्र  विचार नहीं कि  हमें उत्तरोत्तर कानून एवं व्यवस्था को  सुदृढ़  बनाना चाहिए परन्तु यह भी एक सत्य है और इसमें कोई बाध्यता नहीं होना चाहिए परन्तु सामाजिक जीवन मेँ अपने आचरण को सही रखने मेँ कोई बुराई नहीं है। बुरी परिस्थितियों से हर व्यक्ति परिचित है इसलिये हर माता पिता अपने बच्चों को ठीक रख रखाव की शिक्षा देते हैं।  इसी संधर्व मेँ मुख्यमंत्री जी ने पिता तुल्य शिक्षा ही दी है जिसका शोरगुल ऐसे लोग मचा रहे हैं जो हर बात की निंदा को ही अपना धर्म समझते , और हर बात में राजनीति देखते हैं। 

सुखविंदर सिंह परमार       


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